विभागीय गलती की सजा अधिकारी को नहीं: हाईकोर्ट ने PWD इंजीनियर की वरिष्ठता और पदोन्नति बहाल की

बृजेश कुमार पटोरिया की नियुक्ति वर्ष 1993 में अविभाजित मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग में उप अभियंता के पद पर हुई थी। राज्य पुनर्गठन के समय वे जगदलपुर में पदस्थ थे। वर्ष 2002 में अंतिम कैडर आवंटन में उन्हें मध्य प्रदेश संवर्ग मिला। इस आवंटन के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
इसके बाद केंद्र सरकार की नीति के तहत वर्ष 2005 में मलय कुमार श्रीवास्तव के साथ आपसी सहमति से उनका छत्तीसगढ़ संवर्ग में तबादला हुआ। छत्तीसगढ़ आने के बाद विभाग ने उनकी पूर्व सेवा को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठता निर्धारित की। इसी वरिष्ठता के आधार पर उन्हें वर्ष 2007 में सहायक अभियंता और सितंबर 2008 में कार्यपालन अभियंता के पद पर पदोन्नति दी गई।
वर्ष 2013 और 2015 में एक अन्य अधिकारी की आपत्ति के बाद सरकार ने वर्ष 2005 के परिपत्र के नियम 9 का हवाला देते हुए परस्पर तबादले से आए कर्मचारियों की वरिष्ठता पर पुनर्विचार किया।
इसके बाद 9 दिसंबर 2015 को पटोरिया की वरिष्ठता सूची संशोधित कर दी गई। फिर 15 जुलाई 2016 को हुई पुनरीक्षण पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक में उनकी सहायक अभियंता पद पर पदोन्नति को वर्ष 2003 के बजाय वर्ष 2008 से माना गया। वरिष्ठता में इस बदलाव का असर उनकी कार्यपालन अभियंता पद की पदोन्नति पर पड़ा और उन्हें पदावनत कर दिया गया।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पटोरिया ने वरिष्ठता या पदोन्नति हासिल करने के लिए कोई गलत तथ्य प्रस्तुत नहीं किया था। विभाग ने खुद उनकी वरिष्ठता निर्धारित की थी और लंबे समय तक उसी के आधार पर उन्हें पदोन्नति का लाभ दिया।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासन की अपनी गलती का खामियाजा वर्षों बाद कर्मचारी को नहीं भुगताया जा सकता। साथ ही, जिस अधिकारी की आपत्ति के आधार पर वरिष्ठता में बदलाव किया गया था, वह भी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर 2015 और 15 जुलाई 2016 के संबंधित आदेशों को रद्द करते हुए पटोरिया की पूर्व वरिष्ठता और उसके आधार पर मिली पदोन्नति की स्थिति बहाल करने का निर्देश दिया है।
