हाईकोर्ट ने बदला फैमिली कोर्ट के आदेश को, अब बच्चे की कस्टडी मां को

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने पिता की जगह बच्चे की कस्टडी मां को सौंपने के आदेश दिए हैं। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने रायगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया है। फैमिली कोर्ट ने मां के साथ रह रहे बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी थी। महिला ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण, सुरक्षा और भावनात्मक संतुलन जरूरी है। इसलिए मां को कस्टडी देना उचित होगा। हालांकि पिता को सप्ताह में चार दिन वीडियो कॉल पर बात करने और छुट्टियों में मिलने की अनुमति दी गई है। रायगढ़ में रहने वाली नेहा और कौशल का विवाह 6 मई 2011 को हुआ था। उनके बेटे नवल किशोर का जन्म 30 दिसंबर 2013 को हुआ। शादी के कुछ समय बाद पति- पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया।
10 अक्टूबर 2018 को नेहा बेटे को लेकर मायके चली गई। तब से दोनों अलग रह रहे हैं। पति ने तलाक के लिए आवेदन दिया। कोर्ट ने तलाक मंजूर किया और पति को भरण-पोषण के लिए 3 हजार रुपए मासिक और 5 हजार रुपए मुकदमे पर हुआ खर्च देने का आदेश दिया था। मां ने कहा- पिता के साथ जाने को तैयार नहीं बेटा: मां ने कहा कि बेटा 5 साल से कम उम्र का था, जब वह उसे लेकर अलग हुई। तब से बेटे की देखभाल कर रही है। कोर्ट ने पाया कि बेटा 2018 से मां के साथ रह रहा है। 4 दिसंबर 2023 और 4 सितंबर 2024 को न्यायमित्र और मध्यस्थ के माध्यम से बच्चे से बातचीत की गई तो बच्चे ने कहा कि वह पिता के पास जाने के लिए तैयार नहीं है।
पिता को मिली यह छूट: कोर्ट ने पिता को बच्चे से मुलाकात और संपर्क करनेका अधिकार दिया है। हर शनिवार और रविवार को एक घंटे और मंगलवार व गुरुवार को 5-10 मिनट वीडियो कॉल की अनुमति दी गई है। दोनों पक्षों को स्मार्टफोन रखना होगा ताकि वीडियो कॉल हो सके। लंबी छुट्टियों में 5-10 दिन के लिए बेटा पिता के साथ रह सकेगा। त्योहारों पर पिता बेटे से मिल सकेगा। मां और बेटा मुंबई में रहते हैं। उनका पता और मोबाइल नंबर पिता को दिया जाएगा। बदलाव की स्थिति में नई जानकारी देना अनिवार्य होगा। तलाक के बाद पति ने बेटे की कस्टडी के लिए आवेदन दिया। वह एक निजी कंपनी में सहायक प्रबंधक के पद पर ओडिशा में कार्यरत है। उसने कहा कि बेटा उसके साथ रहे तो उसका भविष्य बेहतर होगा। फैमिली ने पिता के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ मां ने हाईकोर्ट में अपील की।