राज्य अलंकरण समारोह : उपराष्ट्रपति के हाथों महासमुंद की बेटी को मिला रानी वीरांगना अवंती बाई लोधी सम्मान, प्रेमशीला ने संघर्ष से लिखी बदलाव की नई इबारत
महासमुंद। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2025 के अवसर पर राज्य अलंकरण समारोह में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने महासमुंद की बेटी प्रेमशीला बघेल को महिला सशक्तिकरण के लिए रानी वीरांगना अवंती बाई लोधी सम्मान से सम्मानित किया। प्रेमशिला महासमुंद की पहली महिला हैं, जिन्हें यह पुरस्कार मिला। प्रेमशीला बघेल की सफर दो कमरों के मिट्टी के घर से सफर शुरू हुआ और न्यूयॉर्क तक की यात्रा मंजिल बनी। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है।
महासमुंद में जन्मी प्रेमशीला का बचपन अभावों और संघर्षों में बीता। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, दो बहनों में छोटी बेटी के रूप में घर में पहचान बनी। घर में दो वक्त की रोटी भी कभी मयस्सर नहीं थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास तीनों ही उनके लिए एक सपना भर थे, पर जब 19 वर्ष की उम्र में बाबू जी ने उन्हें एक सामाजिक संस्था के काम से जोड़ा तो उन्होंने उसी राह को अपनी मंजिल मान लिया। एक बेटी ने जिस तरह खुद को और परिवार को संभाला ये कई बेटे भी नहीं कर पाते। यहीं से शुरू हुआ महिलाओं का सामाजिक जागरूकता का सिलसिला, जो आज तक जारी है।
संघर्ष नहीं, ध्येय बना जीवन
वर्ष 1996 से महिलाओं और वंचित समुदायों के हक की लड़ाई में सक्रिय प्रेमशीला ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखी। छत्तीसगढ़ महिला जागृति संगठन में 11 वर्षों तक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने हजारों महिलाओं को उनके अधिकार, स्वर और स्वाभिमान से जोड़ा। इस दौरान न्यूयॉर्क में आयोजित वल्र्ड मार्च ऑफ वुमन वर्ष 2000 में महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और गरीबी जैसे ज्वलंत मुद्दों को दुनिया के सामने रखने संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय के समक्ष एकजुट होकर दृढ़ता से संदेश पहुंचाया। भारत की 25 संघर्षरत महिलाओं के साथ छत्तीसगढ़ की ओर से प्रतिनिधित्व कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
अभावों से आगे बढ़कर शिक्षा में रची इबारत
जहां अभाव थे, वहीं प्रेमशीला अवसर तलाशे। शुरुआती पढ़ाई के बाद बीच में पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन रुकना उन्हें मंज़ूर नहीं था। उन्होंने काम करते हुए एमए समाज शास्त्र, मास्टर ऑफ सोशल वर्क और छत्तीसगढ़ी भाषा में स्नातक डिप्लोमा की, जो बताता है कि जिंदगी में कभी भी देर नहीं होती, अगर इरादा मजबूत हो। विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं में काम करने के बाद खुद का संगठन चलाकर अपने अनुभवों को जमीन में उतारने की जिजीविषा ने एक नए संस्था उन्नयन जन विकास समिति को जन्म दिया। वर्ष 2005 में इस एनजीओ की मुखिया बनकर प्रेमशीला ने कमान संभाली।
हर मोर्चे पर महिलाओं की बनीं आवाज
प्रेमशीला का सामाजिक कार्य सिर्फ भाषणों या सभाओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया। उन्होंने काम करते हुए अपनी संस्था को मजबूत किया। बहुत छोटे-छोटे फंड की मदद से सामाजिक मुद्दों पर कार्य करना शुरू किया। महासमुंद जिले में लगभग 1500 महिला समूहों के बैंक खातों का डिजिटलीकरण करवाया।
नाबार्ड, एनयूएलएम जैसी योजनाओं के साथ ग्रामीण और शहरी 15000 महिलाओं के समूह को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में पहल की।महिला हिंसा, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल श्रम और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर सम्मेलन, प्रशिक्षण, नुक्कड़ नाटक और कानूनी जागरूकता अभियान के माध्यम से संदेश देती रही।
कुष्ठ पीडि़त दिव्यागों के स्व-सहायता समूह बनाकर वंचित एवं समाज से कटे हुए लोगो की आवाज बनी। इसके अलावा सन 2000 में महिलाओं पर बढ़ते हिंसा एवं गरीबी जैसे ज्वलन्त मुद्दों को संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से वर्ड मार्च आफ वूमेन जैसे कार्यक्रम में भाग लिया। वर्तमान में महिलाओं के आजीविका पर कार्य कर रही है। उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में 1996 से 2005 तक महासमुंद स्थित सामाजिक संस्था से बालवाड़ी शिक्षिका से सामाजिक बदलाव की शुरूआत की। तब से आज तक अनवरत शासकीय और अशासकीय संस्थाओं के साथ मिलकर आवाज बुलंद कर रही है।