छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: दबाव में दिया इस्तीफा पहले परखा जाएगा, तुरंत स्वीकार करना सही नहीं

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के इस्तीफे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी ने अपने त्यागपत्र में यह स्पष्ट लिखा है कि वह धमकी या दबाव में इस्तीफा दे रहा है, तो नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह पहले इसकी सत्यता की जांच करे। बिना जांच-पड़ताल के ऐसे इस्तीफे को स्वीकार करना कानून की नजर में उचित नहीं माना जा सकता।
यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने चौकसे इंजीनियरिंग कॉलेज की ओर से दायर अपील पर सुनवाई के दौरान दिया। कॉलेज ने सिंगल बेंच के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एक सहायक प्राध्यापक के इस्तीफे की स्वीकृति को रद्द कर उसे सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।
मामला वर्ष 2020 का है। सहायक प्राध्यापक ने 21 सितंबर 2020 को अपना इस्तीफा दिया था। इस्तीफे में उन्होंने साफ लिखा था कि कॉलेज के दो सहकर्मियों की कथित धमकी और दबाव के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ रही है। इसके बावजूद कॉलेज प्रबंधन ने बिना किसी जांच के उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
बाद में कर्मचारी ने हाईकोर्ट का रुख किया। सिंगल बेंच ने माना कि इस्तीफा स्वेच्छा से नहीं दिया गया था और उसकी स्वीकृति को निरस्त करते हुए कर्मचारी को सेवा में बहाल करने, बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ देने का आदेश दिया।
कॉलेज प्रबंधन ने डिवीजन बेंच में अपील करते हुए कहा कि इस्तीफा स्वेच्छा से दिया गया था और सक्षम प्राधिकारी ने नियमों के अनुसार उसे स्वीकार किया। प्रबंधन का यह भी तर्क था कि दबाव या धमकी के आरोपों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और जिन दो सहकर्मियों पर आरोप लगाए गए थे, उन्होंने शपथपत्र देकर आरोपों से इनकार किया है।
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस्तीफे के पत्र में ही कर्मचारी ने स्पष्ट रूप से दबाव और धमकी का उल्लेख किया था। ऐसी स्थिति में कॉलेज प्रबंधन का दायित्व था कि वह इस्तीफा स्वीकार करने से पहले मामले की निष्पक्ष जांच करता और यह सुनिश्चित करता कि कर्मचारी स्वेच्छा से इस्तीफा दे रहा है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि बाद में सहकर्मियों द्वारा आरोपों से इनकार करने वाले शपथपत्र देने से उस समय की गई लापरवाही को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं था। ऐसे में कर्मचारी को सेवा में बहाल करने के साथ-साथ बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ भी दिए जाने चाहिए।