बरी होने के बाद भी मुकदमे जारी रखना मानसिक क्रूरता, हाईकोर्ट ने पति को दी तलाक की मंजूरी

यह फैसला जांजगीर निवासी विशंभर प्रसाद राठौर की याचिका पर न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की युगलपीठ ने सुनाया। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के 8 अगस्त 2019 के फैसले को रद्द करते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली।
मामला विशंभर प्रसाद राठौर और कोरबा निवासी मनीषा राठौर के विवाह से जुड़ा है। दोनों की शादी 2 जून 2015 को हुई थी। पति ने तलाक की मांग करते हुए पत्नी पर दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और घर में लगातार अशांति पैदा करने के आरोप लगाए थे। इसके अलावा पति ने दावा किया था कि पत्नी की मानसिक बीमारी की जानकारी विवाह से पहले उससे छिपाई गई थी।
हालांकि, परिवार न्यायालय ने इन आधारों को पर्याप्त नहीं मानते हुए 8 अगस्त 2019 को तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की।
वैवाहिक विवाद के दौरान पत्नी की शिकायत पर पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में 14 दिसंबर 2023 को अदालत ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद पत्नी की ओर से बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए दायर अपील भी 7 मार्च 2025 को खारिज हो गई।
इसके अलावा घरेलू हिंसा कानून के तहत दायर आवेदन भी खारिज हो चुका था और उसकी अपील 23 अगस्त 2024 को निरस्त कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी द्वारा कानूनी शिकायत दर्ज कराना मात्र मानसिक क्रूरता नहीं है। लेकिन किसी मामले में आरोपी के बरी होने के बाद भी लगातार उसी विवाद से जुड़ी कानूनी कार्यवाही जारी रहना और उसकी वजह से दूसरे पक्ष को लंबे समय तक मानसिक तनाव और पीड़ा झेलनी पड़े, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
पीठ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के रानी नरसिम्हा शास्त्री और राकेश रमन से जुड़े फैसलों का भी उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में लगातार चल रही कानूनी कार्यवाही से पति को मानसिक पीड़ा, तनाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों को देखते हुए पत्नी के आचरण को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में रखा गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पत्नी की कथित मानसिक बीमारी को तलाक का आधार मानने से इनकार कर दिया। अदालत के सामने पेश मेडिकल रिकॉर्ड में डॉक्टर ने बीमारी को उपचार योग्य बताया था और कहा था कि इलाज के बाद पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकती है।
कोर्ट ने माना कि पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं कि बीमारी विवाह से पहले से मौजूद थी और इतनी गंभीर थी कि पति से पत्नी के साथ रहना जारी रखने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अंततः हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी से जुड़ी दलील को स्वीकार नहीं किया, लेकिन मामले की अन्य परिस्थितियों और लगातार चली कानूनी कार्यवाही को मानसिक क्रूरता माना। युगलपीठ ने परिवार न्यायालय के 8 अगस्त 2019 के आदेश को रद्द करते हुए पति की तलाक याचिका मंजूर कर ली और 2 जून 2015 को हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
