हर तीसरा Gen Z लोन में डूबा : डिजिटल लेंडिंग, क्रेडिट कार्ड और Buy Now-Pay Later जैसी सुविधाओं ने युवाओं के लिए कर्ज लेना बेहद आसान बना दिया है। इसका असर अब आंकड़ों में भी दिख रहा है। 2000 के बाद जन्मी पीढ़ी के लिए पहला लोन लेने की औसत उम्र घटकर करीब 22 साल रह गई है।
इंदौर की IT कंपनी में काम करने वाली स्नेहा इसका उदाहरण हैं। ₹32 हजार मासिक सैलरी के बावजूद उनके पास दो क्रेडिट कार्ड और एक पर्सनल लोन है। EMI और मिनिमम ड्यू मिलाकर हर महीने करीब ₹9 हजार, यानी लगभग 28% आय कर्ज चुकाने में चली जाती है। वहीं जयपुर के अर्जुन ने ट्रैवल और कॉन्सर्ट का खर्च क्रेडिट कार्ड से किया और पूरा बिल न चुका पाने के कारण ब्याज का बोझ बढ़ता गया।
आंकड़ों के मुताबिक, देश की करीब 89 करोड़ कर्ज योग्य आबादी में 28% लोग क्रेडिट एक्टिव हैं, जबकि 2017 में यह आंकड़ा सिर्फ 11% था। मार्च 2026 तक 35 साल से कम उम्र के लोग क्रेडिट एक्टिव आबादी का 39% हिस्सा बन चुके हैं।
छोटे पर्सनल लोन में फिनटेक कंपनियों की भूमिका भी तेजी से बढ़ी है। ₹50 हजार से कम के पर्सनल लोन में फिनटेक की हिस्सेदारी 56.8% तक पहुंच गई है और करीब आधे ऐसे लोन 35 साल से कम उम्र के लोगों को दिए जा रहे हैं।
RBI की जून 2026 की Financial Stability Report के अनुसार, मार्च 2026 में सिक्योर्ड रिटेल लोन का ग्रॉस NPA 0.7%, जबकि अनसिक्योर्ड रिटेल लोन का NPA 1.7% था। यानी बिना गारंटी वाले कर्ज में जोखिम ज्यादा है।
म्यूजिक कॉन्सर्ट, ट्रैवल और लाइफस्टाइल खर्च भी युवाओं के क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन इस्तेमाल की बड़ी वजह बन रहे हैं। ऐसे में छोटी-छोटी EMI और मिनिमम ड्यू लंबे समय में बड़ा वित्तीय बोझ बन सकती हैं।
TransUnion CIBIL के अनुसार, देश की क्रेडिट एक्टिव आबादी में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 2017 के 4% से बढ़कर मार्च 2026 में 6% हो गई। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में क्रेडिट ग्रोथ तेज रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल कर्ज वित्तीय समावेशन के लिए अच्छा है, लेकिन युवाओं को कर्ज लेने से पहले कुल ब्याज, EMI और चुकाने की क्षमता समझना बेहद जरूरी है। बढ़ता अनसिक्योर्ड कर्ज आने वाले समय में युवाओं की बचत, क्रेडिट स्कोर और वित्तीय स्थिरता पर असर डाल सकता है।